बुधवार, 25 जून 2014

गौधूलि


आज-कल तरस गये हैं कान मेरे सुनने को बैलों की घण्टियां
आजकल नहीं सुनाई देती हैं घर लौटती गायों की रंभाहट
आज कल ढूंढता हुं शामों को धूल के गूब्बार की आहट
लौटा दो मुझको कोई वो गोधूलि की धूल की महक।1

नहीं दिखते हैं मुझको गुनगुनाते ग्वाले
नहीं दिखता झुण्ड के पीछे बजता ग्वाले का अळगुंजा
आज कल ढूंढता हुं में वो बकरियों की मिमियाहट
लौटा दो मुझको कोई गोधूलि की धूल की महक।2

अट्टालिकाओं में घुटता हैं दम मेरा
नहीं दिखती मुझको वो शीतल झोंपङियां
आजकल ढूंढता हूं में झोंपङियों में हुक्का फुंकते डोकरों की बंतळ
लौटा दो मुझको कोई  गोधूलि की धूल की महक।3

कम्प्युटर की दुनिया में खो गया बचपन का बचपना
बुजुर्ग तो जैसे छू ही हो गये हैं आंगन से
आजकल ढूंढता हुं में धूल में लोटते घरोंन्दे बनाते बच्चों को
लौटा दो मुझको कोई वो गोधूलि की धूल की महक।4

नहीं सुनाई देती आजकल लोक गीतों की लहरियां
कानफोङू संगीत में दम घुटता हैं मेरा
आजकल ढूंढता हुं अपनी माटी के गीतों की खनक
लौटा दो मुझको कोई वो गोधूलि की धूल की महक।5

ऊंची अट्टालिकाओं में कहीं खो गया हैं मिनखपणां
खेत खलिहानों से तो टूट गया हैं नाता
आजकल ढूंढता हुं, आते-जाते इधर-उधर मिल जाये मिनख
लौटा दो मुझको कोई वो गोधूलि की धूल की महक।6

                                                       ___
                                                     सुमेर

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