सोमवार, 14 जुलाई 2014

कुल्फीवाला

उस समय मेरी ड्युटी रेगिस्तानी कस्बे माडधरा के डाकघर में थी। मेरा सरकारी आवास कस्बे के किनारे पर सङक के पास एक बङे टीले पर था। अबकी बार बारिश का मौसम थौङा जल्दी आ गया था। हल्की बारिश के बाद मौसम सूहावना हो गया। मैं बाहर आ गया और धोरे पर चारपाई लगाकर किताब पढने लगा। शाम को मांगू कुल्फीवाला अपना ठेला लेके आ जाता था। मुझे उसकी आदत सी हो गई थी मैं रोज़ उससे फ़ल खरीद लिया करता था। सब्जी व फ़लों के साथ-साथ गर्मियों में कुल्फियां भी बेचा करता था। आज वो मुझे बिना फ़ल दिये ही गुजरने लगा तो मैनें उसे आवाज़ लगाई, अरे! मांगू आज फ़ल नहीं दोगे क्या? तो वो बोला, भाई आज फ़ल खत्म हो गये बारिश का मौसम हैं ना इसलिए लोगों ने सब ख़रीद लिए। तभी मुझे याद आया की उसके पहले के सौ रुपये बाकी हैं। शायद वो भूल गया था। मैं उससे रुकने का बोलकर अंदर जाकर पैसे ले आया। मैनें उससे कहा की ये लो तुम भूल गये उस दिन मेरे मित्र आये थे ना तो ज़्यादा फ़ल ले लिए थे। तुम्हारे सौ रुपये बाकी थे। ज्यों ही मैनें उसे रुपये पकङाऐ वो उछल पङा। एक सीधे-सादे इंसान जिसको कभी हंसते हुए भी नहीं देखा, उसका इस तरह उछलना मुझे अज़ीब लगा। मैनें पुछा अरे मांगू क्या हो गया आज इतना खुश कैसे, तो वो बैठ गया और अपनी जीवन कथा सुनाने लगा। उसने कहा कि मेरा बाप शराबी था। इस कारण उसको कहीं नौकरी भी नहीं मिलती थी। मां घरों में झाङू पोंछा करके जो रुपये कमाती वो घर ख़र्च एवं बाप की शराब में पूरे हो जाते। मैं पढना चाहता था पर तंगहाली के कारण पढ नहीं पाया। तेरह-चौदह साल का होते-होते मुझे एक ठेले वाले के साथ भेज दिया, जो फ़ल,सब्ज़ी एवं कुल्फियां बेचा करता था। मैं दिनभर ठेला खींचता मुझे रोज़ के पचास रुपये मिलते जाते। मई-जून का समय मेरे लिए सबसे बेहतर होता, मैं बच्चों को कुल्फियां बाँटने में बेहद आनंद महसुस करता था। बीस साल का होते ही मेरी शादी कर दी। उस समय मैनें खुद का ठेला ले लिया। अब मैं कस्बे कि बज़ाय गाँवों में जाने लगा। गर्म दोपहरों में धोरों की बीच तपती सङकों पर ठेला खींचकर रोज़ाना दो-ढाई सौ रुपये कमा लेता था। गाँवों से वापस लौटते समय कस्बे के बाहर की तरफ़ खेजङी के नीचे मटकी वाले बाबा के पास आराम करता था। मटकी वाले बाबा आते-जाते राहगीरों को पानी पिलाया करते थे। मैं भी उनको रोज़ मुफ़्त में कुल्फी एवं फल खाने को दे दिया करता था। कुछ समय बाद मेरे लङका हूआ तब मैनें ठान लिया की इसको पढा लिखा के कुछ बनाउंगा। इस बार वह चार साल का हो गया था। उसको स्कूल में दाखिला दिलवाना था। कस्बे में दो ही स्कूल थे। सरकारी स्कूल तो कभी-कभार ही खुलता था। पहली जुलाई को में उसको लेकर निजी स्कूल में दाखिला करवाने गया वहां से फॉर्म लेकर क्लर्क से भरवाया और हेडमास्टर के पास गया। उनको फॉर्म और पाँच हज़ार रुपये दिये। उन्होने फॉर्म देखा और कहा कि फ़ीस तो पाँच हज़ार पाँच सौ रुपये हैं। मैंनें कहा साहब गरीब हूं इतने ही रुपये हैं। हेडमास्टर ने मुझे झिङक दिया और कहा रुपये नहीं हैं तो सरकारी स्कूल में भर्ती करवाओ ये कोई मनिहारिन की दुकान नहीं हैं जो कम कर दो। और पैसे हो तो कल दस बजे से पहले आ जाना बाद में दाखिला बन्द हो जायेगा। मैं बङे बेमन से बच्चे को लेकर घर लौट आया। घर को खंगाला तो दौ सो रुपये और मिल गये अब तीन सौ रुपये कम पङ रहे थे और दस बजे थे। मैनें ठेला उठाया, सब्जियां लादी और चल पङा बरसात का मौसम होने के कारण सब्जियां जल्दी ही बिक गई तीन सौ रुपये हो गये।कुछ फ़ल मटकी वाले बाबा के लिए बचाए थे। बारिश का मौसम था, थोड़ी बून्दाबादी हो चुकी थी। में जल्दी से घर पहुंचने के लिए तेजी से चल पङा। ज्यों ही मटकी वाले बाबा की खेजङी पहुंचा, देखा बाबा बेहोश पङे हैं। उन्हे ठेले पर लिटाया और कस्बे के डॉक्टर साब्ब के पास ले गया। डॉक्टर ने मुँह पर पानी छिङका तो बाबा को होश आ गया। कुछ दवाईयां दी। डॉक्टर ने कहा कि भूख के कारण बेहोश हो गये थे। इस सब पर सौ रुपये खर्च हो गये। मैनें बाबा को वापस खेजङी के नीचे छोङा, उन्हे फ़ल ख़िलाए और घर चल पङा। अब सौ रुपये कम पङ गये। मैं सोचने लगा की अब मैं सौ रुपये कहां से लाउंगा। मेरा लङका अच्छे स्कूल में नहीं पढ पायेगा। वो भी मेरी तरह ठेला खींचेगा। इस तरह सोचते हुए जा रहा था की तभी आप ने पुकार लिया। अब मेरे पास तीन सौ रुपये हैं। कल पूरे पैसे जमा करा के बच्चे का दाख़िला करवा दूंगा। वो अच्छी स्कूल में पढेगा और मेरी तरह कुल्फीवाला नहीं बनेगा। और मुझे दुआएं देते फिर से उछलता हूआ ठेला लेकर घर की और निकल पङा।

1 टिप्पणी:

  1. आप और जितने भी भले लोग हैं,सरकारी स्कूल में ही पढ़े,,,,,,भली स्कूल?

    उत्तर देंहटाएं