मंगलवार, 22 जुलाई 2014

ऐ! तिलोर

ऐ! तिलोर
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क्यूं तू आती हैं इतना सफ़र तय करके
अफ्रीका से रेगिस्तान तक का,
जब की तुझको ये पता हैं
तू खोती हैं कितने अपनों को
हर फेरे में।

तू सोचती हैं यहां की अनूकुलता में
अपनी जान बचाएगी
पर घूम रहे जो ये बन्दूकों वाले पापी
इनसे खुद को कैसे तू बचाएगी।

तू दिखने में कितनी सुन्दर हैं
जितना हर्ष मुझे तुझको देखने में हुआ
उतना हर्ष मुझे ना मिला तुझको खाकर।

अब से तू ना आइयो,
इन बोरङियों में इन केरों में,
हड्डियों के भूखे घूम रहे हैं,
लेकर बन्दुकें सेवणो में।

थोङी सी सर्दी तू सह लेना पर यहां आके मारी ना जाना,
यहां आई तू तो तुझको खा जाएंगे
जंगलों के रखवाले
ए! तिलोर तू कितनी सुन्दर हैं दिखने में।
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सुमेर

(तिलोर- Houbara Bustard)

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