बुधवार, 6 अगस्त 2014

रेगिस्तान में बारिश

लोगों को बाहर घूमने का शौक़ होता हैं, हालांकि मुझे भी हैं पर सबसे ज़्यादा मुझे अपना रेग़िस्तान ही प्यारा लगता हैं।

 सब के मन में रेगिस्तान की एक ही तस्वीर होती हैं निर्जन क्षैत्र और हमेशा गर्मी का मौसम। पर यहां तो तीनो ही मौसमों के रंग देखने को मिलते हैं। रेगिस्तान में पहले तो गर्मी और सर्दी अपने पूरे शबाब पर होते थे। गर्मियों में पारा 50 डिग्री के पार और सर्दियों में 0 डिग्री के नीचे तक हो जाता हैं। और अब कुछ सालों से तो बारिश भी अच्छी होने लगी हैं। मुझे दिन की बारिश और रात की ठण्डी हवाएँ बेहद पसंद हैं, पर अधिकतर बारिश रात को होती हैं, जो माहौल डरावना बना देती हैं।
राजस्थान के पश्चिमी भाग में मानसून पन्द्रह जुलाई के आसपास दस्तक देता हैं। और  इस बार भी बीच जुलाई में बादलों ने रेगिस्तान की चोख़ट पार की। पहले तो मौसम विभाग की कम बारिश की चेतावनी से सब चिन्ता में थे पर सफ़ेद बादलों के कारवाँ ने उनके माथे से चिन्ता की लक़ीरें कुछ कम कर दी। पहले-पहल तो सफ़ेद रुई से बादल छाये और फ़िर आँधियों के साथ होने लगी हल्की बूंन्दाबादी। और शुरु हो गई बिज़ली की कङकङाहट।

 आधा सावन बीतते-बीतते तीज़ के झूलों
 के साथ ही अच्छी बारिश शुरु हो गई।

 बारिश शुरु होते ही बच्चे नंगधङंग बूंदों  को बाहों में समेटने के प्रयास में घरों से निकल पङे। बोछारों से सफ़ेद माहौल, गलियों में बहता पानी और भरे हुए गड्ढे बारिश  के आम नज़ारे चारों और दिखने लगे।



 बारिश रुकने के बाद मेढकों की टरटराहट, किसानों की बैचेनी(वें जमीन को ख़ोदकर देखते हैँ कि कितना पानी बरसा हैं और बारिश ख़ेती लायक हैं या नहीं), टीलों पर घरोन्दे बनाते-तोङते बालक और शाम का लालीमय आसमान ये सब गाँव के मनमोहक बरसाती नज़ारे दिखने लगे हैं।

 और अब होगा किसानों के पेरों का खेतों की पगडंडियों से मिलन। पशुओं के लिए हरा चारा होगा। जाळें, खेजङियाँ, केर, और थोरों पर हरियाली चूनर बिछ जायेगी। और रेगिस्तान की सुनहरी धरा कुछ समय के लिए हरियल होकर झुम उठेगी।



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