शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

ना मिले तुम

ना मिले तुम
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कल्पनाओं की ख़ाट बुनी,
तुमको भी साथ बिठाने का सोचा,
कोईये में कच्चे डोरे मिल गये,
ना मिले तुम।

पीलू की मिठास से तौला,
सांगरी के स्वाद सा सोचा,
पाके की तरह चुमने का सोचा,
ना मिले तुम।

मैं पुरानी बेरी का पानी,
तुम रेत में बारिश की महक,
रेत और पानी मिल गये,
ना मिले तुम।

मैं चिलम की साफी सा ठण्डा,
तुम दाखों के दारुं सी तेज,
इक दुजे को पीने का ख्वाब बुना,
ना मिले तुम।

सेवण उग आई धोरों में,
तिलोरें आ गई अफ्रीका से,
मैनें बहुत सजायी राहें,
ना मिले तुम।

गौधूलि में गायें भी लौटी,
खेतोँ के किसान भी लौटे,
धुल भी उङते उङते थक गई,
ना मिले तुम।













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सुमेर

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