शनिवार, 9 अगस्त 2014

धोरों में घुली हैं मिठास


धोरों में घुली हैं मिठास
(सुमेर सिंह लौद्रवा)

जैसलमेर




हमारी कल्पनाओं में एक रेगिस्तान
की तस्वीर क्या होगी? चारों तरफ़
निर्ज़न टीले,
धूल ही धूल और जनशुन्य क्षैत्र। पर थार
का रेगिस्तान ऐसा नहीं हैं। पाकिस्तान
के पूर्वी भाग से लेकर राजस्थान
की अरावली पर्वतमाला के मध्य विस्तृत
विशाल
थार रेगिस्तान में पानी की कमी भले
ही हैं पर यह अपने में कईं नायाब ख़जाने एवं
थातियां समेटे हुए हैं। भारत में राजस्थान
के जैसलमेर-बाङमेर, जोधपुर एवं
बीकानेर जिलों में फैले इस थार के
रेगिस्तान में एक ऐसी मिठास हैं जो कानों
में मिश्री की तरह घुल जाती हैं। यह
मिठास हैं, यहां का लोक-संगीत। यहां पर
संगीत से जुङी हुई कईं जातियां बसती हैं
जिनमें मांगणियार एवं लंगा मुख्य हैं,
इनमें यह प्रथा पीढी-दर-पीढी चली आ
रही हैं। पहले ये अपने जजमानों के शुभ
अवसरों पर गाते-बजाते थे। लेकिन धीरे-
धीरे इनकी कला को देश-विदेश में सम्मान
मिलना शुरु हुआ तो बाहर भी जाने लगे। इन
गायकों के पास अनेक तरह के मधूर
वाद्ययंत्र हैं जिनमें खङताल, कमायचा,
बाजा, मोरचंग, ढोलक आदि मुख्य हैं। आप
एक नजारे की कल्पना कीजिए
'मिट्टी का बना हुआ घर, आस पास रेत के
टीले, घर के
बाहर मांगणियारों का समुह, और वह समुह
पारम्परिक वेशभूषा में स्वर लहरियां
बिखेर रहा हैं' प्रथमतया तो आपको इस
नजारे की कल्पना ही आकर्षित कर
देगी और इस
नजारे को आँखो से देखना तो सम्मोहित कर
देगा। डोरो, धूमलङी, बायरियो, मूमल,
बरसाळो आदि कुछ प्रसिद्ध लोकगीत हैं।
हालांकि नई यूवा पीढी अब लोकसंगीत
को
भुलाकर आधुनिक मशीनी संगीत
की दीवानी हुई जा रही हैं। वर्तमान में
लोक-संगीतकारों को विदेश में बङा मान-
सम्मान मिल रहा हैं। देश-विदेश में होने
वाले महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में एवं
उत्सवों में लंगा-मांगणियार मुख्य आकर्षण
होते हैं। कमायचा वादक स्व. साकर
खां को पद्म श्री सम्मान भी मिल चुका हैं।
मामे खां, कूटले खां, गाज़ी खां, रईस
खां आदि जाने-पहचाने नाम हैं।
आशा हैं कि हमारी इस विरासत को बचाये
रखने के लिए स्थानीय लोगों एवं सरकार
द्वारा उचित मान-सम्मान
दिया जायेगा।

Gaon Connection.

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