गुरुवार, 14 अगस्त 2014

बे-दोस्त के दोस्त

कितने प्यारे हैं बे-दोस्त के दोस्त
आप भी मिलिए ना दिल खोल
ठहरे हैं अनवरत अपनी जगह
ज़बकि में घुमक्कङ दाढी वाला।

एक हैं छत से सटा बरगद
शीतल छाया बिखेरता
उसकी छाया तले
ना जाने कितनी उङानें उङी।

दूजी हैं हरियल जाळ
मेरा बचपन से रही ठिकाना
कभी किताबें खोले बैठा
कभी बच्चा बन डालों पर झूला।

तीजी सूखी खड्ड हैं
आक,खींप, बोरङी लिए
जहां कईं ढलते सूरज देखे
दौङते पैरों को विश्राम मिला।

चौथी पुरानी पठियाळ
जो अब नई हो गई
कईं अख़बार पलटे
कईं चेहरे दिखे यहाँ।

पाँचवी पुरानी कोटङी
तपती दोपहरों को पत्ते कूटे
हाथ बाँधे खङे रहे
गाँव पूरा इकट्ठा देखा यहाँ।

बे-दोस्त के थे ये
पाँच प्यारे दोस्त
इतने प्यारे दोस्त हैं
फ़िर भी 'सुमेरा' बे-दोस्त।
______
सुमेर

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