शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

हरियल ज़िंदगी और सूखे पत्ते



हमारी ज़िंदगी को संवारने में हमारे गुरुजनों का बहूत इम्पोर्टेंट रोल होता है। आज शिक्षक दिवस के मौके पर
 स्कूली जीवन से जुङी कईं यादें स्मृति पटल पर तैर रही है। स्कूली दोस्त, मास्टर हालांकि मेरा मास्टरों से जुङाव इतना नहीं रहा कि उनको याद कर सकुं सिवाय एक-दो को छोङ के। प्रायमरी तक की पढाई गाँव में ही पूरी की। इस दौरान स्कूल में झोंपङियां बनाया करते थे हम दोस्त, यहां भी गुट हूआ करते थे, हर गुट की अलग झोंपङी। एक बार छुट्टी के बाद कोई हमारी झोंपङियों में आग लगा गया था, आरोप मुझ पर भी लगा था। इसी दौरान मुझे याद हैँ कि एक दोस्त के साथ मैंने सिगरेट भी पी थी। दसवीं तक की पढाई पङोस के गाँव रुपसी के माध्यमिक स्कूल में हूई। में भुलक्कङ हूं (और अभी तक नहीं भूला हूं) कईं बार में खेलते-खेलते बस्ता चौराहे पर ही भूल जाया करता था। आठवीं-नवीं में कुछ वन साइड अट्रेक्शन-वट्रेक्शन का मामला था, ज्यादा नही थोङा बहूत। दसवीं के दिनों में कोई नैन-मटक्का करके परेशान किया करती थी पर दोस्तों की मेहरबानी से बाद में उसको चिढाने की तरकीब मिल गई जो खूब एन्जॉयबल रही। एक माङसाब्ब खुब बढाई किया करते थे एक्ज़ाम्पल दिया करते थे हमारा क्यों कि कभी शिकायत ना गई, ना आई मेरी तरफ से। इन सालों में कोई ऐसा दोस्त नहीं मिला जिसने दिल में जगह बनाई हो, हां एक दो फेसबुक सूची में ज़रुर मौजूद हैं। उसके बाद ग्यारहवीं जैसलमेर के (कु)ख्यात हाई सैकण्डरी स्कूल से की जहां क्लास को कून्टा लगाके हाज़री डायरी सहित भाग जाया करते थे। कभी-कभी हिस्ट्री की क्लास ज़रुर अटेंड की जहां माङसाब्ब का डॉयलाग 'क्यां भाईजी ना रोळो हो' अक्सर सुनाई दिया करता था। यहां भी कोई दोस्त नहीं मिला, हां कांटेक्ट सूची में एक नंबर ज़रुर जुङ गया। और उसके बाद बारहवीं, गांधी बाल मंदिर, दोस्त, टीचर, एकटक. यादें। अभी तक का एकमात्र साल जो हमेशा मानस पटल पर छाया रहेगा। जीवन को यहीं से सीखा। अंग्रेजी साहित्य में एकमात्र लङका होने कारण घनश्याम जी माङसाब्ब से अच्छा जुङाव रहा। हिस्ट्री वाले मैडम जी ने शुरु में खूब सुमेर-सुमेर किया, लेकिन एकबार के पुलिस थाने के दर्शन के बाद वो हिस्ट्री हो गया। एकटक तो पहले ही शेयर कर चूका हूं और भी कईं बेहतरीन दोस्त मिले और कुछ फटीचरों से सीखने का भी मौका मिया की जीवन की राहों में बिखरे फूलों के साये में कईं कांटे है उनका भी थेंक्यू। ग्रेजुएशन के अंतिम तीन महिनों के अलावा बाकी का समय जयपुर में काले-पानी की तरह बीता। थेंक्यू प्रेमसा, नरसा, विकसा, उम्मेदसा एंड कुछ और जिनके कारण काला-पानी काटने में मदद मिली। बाद के तीन महिनों में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दर्शन और हरिहर के ज्ञान से बहूत कुछ सीखने को मिला और साहित्य एवं फोटोग्राफी की भूख बढी। पढाई में मैं औसत ही रहा पचास-पचपन के बीच हां आठवीं, बारहवीं और फाइनल में ज़रुर साठ पार किया। 


उम्मीद-ए-ज़िंदगी हैं कि रास्तों में कईं यादें हो कईं फसाने हो ताकि ज़िंदगी रौनक-ए-ज़िंदगी हो।


बादलों भरी शाम की अगली शाम के साफ़-सफ़ेद आसमान तले, सांय-सांय करते बरगद के पत्तों तले ऊबङ-खाबङ पगडंडी के सफ़र के कुछ कौंधे हूए फ़साने ।


Sumer

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