मंगलवार, 7 अक्तूबर 2014

।।खेजङी के नाम कागद।।


हिंये री उजास हरियल खेजङी,




        तुम कितने सालों से खङी हो खेत के धोरे पर 

        अटल, लहराती, बलखाती मदमस्त। पहली बार 

        तुम्हे मैंने तब देखा था जब तुम सांगरियों से लदी हूई थी। 
        हर डाल झुकी थी सांगरियो के भार से जैसे कोई भलमानुष 
        झुका हो। कितनी प्यारी लग रही थी तुम जैसे कोई सज्ज धज्ज 
        कर सुन्दरी खङी हो। और ये खेत का धोरा जो अपनी अकङी पीठ 
        लिए सोया है इसे भी तुम्हारी जङें बाँधे खङी है। कितनी तेज बारिशें 
        सही है तब भी यूँ ही अपना अस्तित्त्व बचाये है धोरा तुम्हारी जङों के 
        सहारे। जब रेगिस्तान नहा उठता है सावन-भादो की तेज फुहारों से तो 
        भीगी मिट्टी में किसान के पसीने से सींचा बाजरा लहलहाता है उसमें भी 
        तुम्हारा बहूत योगदान है। तुमने खेत की जमीन को कितना उपजाऊ 
        बनाया है तुम्हारी तन के कुछ अंग गिरते रहते है खेत में जो सङ-गल 
        कर खाद बन जाते है उन्ही से तो ये रेतीली जमीन फसल उगाने लायक 
        बनती है। जब लहरा रहा होता है बाजरा तब खेत में थके किसान को 
        कितना सुकून देती है तुम्हारी गोद। छककर छाछ पीने के बाद तुम्हारी 
        छाँव में जो नींद आती है वैसी शायद महलों में भी ना आती होगी। कितनी 
        ताकतवर और उपजाऊ है तुम्हारी छाँव की मिट्टी सबसे सुनहरा और बङे 
        सिट्टों वाला बाजरा तुम्हारी छाँव में ही उगता है जिसे देखकर किसान की 
        पसीने भीगी छाती चौङी हो जाती है। कितनी प्रफ्फुलित लगती हो तुम जब 
        लिपटी होती है तुम्हारे तन पर मतीरों एवं खाखङियों की बेलें। तुम्हारी छाँव 
        में रखी कपङा सिली बोतल का पानी तपती दोपहर में भी तुम्हारी ठण्डी हवा 
        में कैसा शीतल हो जाता है, दो घूँट थके किसान को तृप्त कर देते है।

मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम यूँ ही अटल खङी रहो। तुम सदा लहराती रहो।

हरियल सपने लिए तुम्हारा
सुमेर।


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