रविवार, 2 नवंबर 2014

गाँव की तस्वीर


परिवर्तन प्रकृति का नियम हैं। समय के साथ-साथ इस धरतीपर कईं बदलाव हो रहें हैं। पेङों पर रहने वाला मनुष्य घास-फूस के मकान में रहने लगा उसके बाद मिट्टी का मकान फिर पत्थर का मकान और अब यह सफ़र बहूमंजिला अट्टालिकाओं तक पहूंच गया हैं। समय के साथ-साथ हमारे गाँवो की तस्वीर भी बदल रही हैं। अब ग्राम्य जीवन की परिभाषाएं खुद को बदलने के लिए आतुर हैं। कुछ समय पहले तक एक गाँव की तस्वीर क्या थी ग्रामीण क्षैत्रों में आपसी सामंजस्य एवं अपनेपन की भावना कुछ समय पहले तक बेहद सुदृढ थी लेकिन अब इस भावना के साथ-साथ कईं अच्छाईयाँ बदलाव के साये में खत्म होने के क़गार पर है। शादियों में भोज के दौरान बाजोट पर समुह में बैठते थे ओर मनुहारों द्वारा प्रत्येक की सार सम्भाल की जाती थी लेकिन अब तो टेंट में खाना लगता है आओजीमो और जाओ। पूछने पर किसी ने बताया कि अब लोग बढ गये है इसलिए ऐसी व्यवस्था करनी पङती है। ये तो बहाना है असल बात तो ये है कि हर कोई अपने को दिखावे की होङ में शामिल करना चाहता है। पूँजीवाद इस कदर हावी हो गया है कि अब जिसके पास पैसा है वो सर्वोपरि। पहले वाद विवादों को बुजुर्गों एवं समझदार लोगों के द्वारा मिल बैठकर सुलझाया जाता था लेकिन अब तो मामले पैसो के बल पर मिनटों में इधर के उधर हो जाते है।  कहां वो तीन-तीन दिन रुकने वाले बारातें और कहां आज तीन घंटे में खत्म होने वाले कार्यक्रम। सात-सात रातों तक महिलाओं द्वारा की जाने वाली बन्नङों की ढाळे अर्थात शादी के गीत तो डीजे की आवाज़ में कब के दब गये। फसल कटाई या खींपो का घर बनाना हो या फिर छत्त पर पट्टियां चढाने आदि के लिए होने वाला लासीपा तो अब गुजरे दिनों की बात हो गया। मिट्टी के एवं पत्थरों के कच्चे मकानभारी भरकम वेशभूषा। घूघन्ट में औरतें। गाँव से दूर बने कूओं और तालाबों से मटके भर के लाती महिलाएं। चुल्हों पर गोबर के कंडो से पकता भोजन। चबूतरों पर चिलम फूंकते-खाँसते बुजुर्ग। अधनंगे मिट्टी में खेलते एवं साईकिल के पहिए लिए भरी दोपहरी में गलियों में दौङते बच्चे। सुबह शाम खेतों की आबाद पगडंडिया कोई ट्रेक्टर पर तो को सिर पर चारे गठरियां उठाये पशुओं को हांकते हूए दिखता था। गाँव के किनारे बनी स्कूल में कबूतरी रंग के कमीज़ एवं खाकी निकर में आते जाते बच्चे। हर सप्ताह साईकिल पर घूमता डाकिया। ये सब एक गाँव के आम नज़ारे थे। लेकिन अब गाँवो की तस्वीर बदलने लगी हैं। आज के गाँवो की तस्वीर हैंहर घर को आपस में जोङती पक्की सङकों के जाल। हर घर के बाहर पानी का नल। मोबाइल एवं कम्प्युटर में गेम खेलतेरंगीन कपङे पहने बच्चे। विदेशी कपङे पहने ग्रामीण। हर किसी के पास नौकरी एवं खुद का व्यवसाय। विभिन्न प्रकार के स्कूल एवं तरह-तरह कि स्कूली यूनिफॉर्म। गैस-चुल्हों पर पकता और डायनिंग टेबल पर सजता भोजन। पलंग पर सोये टीवी देखते बुजुर्ग।प्रकृति के साथ चलने को स्वीकार कर भी लिया जाए लेकिन बदलता माहौल और हावी होता पूँजीवाद लोगों का अपनत्त्व छीन रहा है। ग्रामीण मध्यम वर्ग की आवभगत एवं आदरभाव की विशेषता विलुप्त हो रही है। उम्मीद हैं कि गाँव और गाँव की कला एवं संस्कृति बची रहेगी। गाँव के लोगों का प्यार एवं अपनत्त्व दिलों में जिन्दा रहेगा और गाँव इतिहास ना बनकर गाँव बना रहेगा।




2 टिप्‍पणियां:

  1. Aapne sahi kaha, change is inevitable. Change to hona he chahiye, pragati ke liye, unnati ke liye aur doosre towns se jodne ke liye.

    Padhai or anay baatein kaam to aati he hain, aaj nahi to kal.
    Mujhe nahi lagta ki गाँव की कला एवं संस्कृति khatre mein hai. Haan bas aav bhagat ka tareeka badal jayega. :)

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  2. सही तो हैं पर मेरे जैसे नॉस्टालज़िक लोगों के लिए अस्वीकार्य है। और हाँ मैडम जी { :-) } आप किस मुगालते में हो। गाँव का अपनापन अब नाममात्र का रह गया है अब तो बस पैसा और छीना-झपटी ही दिखती है।

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