शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

भलां रे घूमे चरखा

जल के कितने रूप है खारा, मीठा, कीचड़, पवित्र इत्यादि। जल मूलत: जल ही होता है और उसमें समाए अवयव उसकी पहचान तय करते है। ठीक उसी तरह हमारी जिंदगी भी एक कोरा पन्ना होती है और उस पन्ने पर छप्पे शब्द उसका मोल तय करते है। एक चरखे की तरह हमारी ज़िंदगी घूमती रहती है धागों के इर्दगिर्द और आपसी सम्पर्क से होती है बेहतरीन बुनाई। बुनाई के लिए चरखे का घूमना जरूरी है ज़िंदगी का भी यहीं फलसफा है ठहरा जीवन कुछ नहीं हासिल कर सकता ना अच्छा ना बुरा। संघर्षरत व्यक्ति के लिए सीढियां स्वत: तैयार होती जाती है और संघर्ष से डरने वाला कुछ प्रारम्भिक सीढियों तक पहूंचकर अपने संघर्ष की इतिश्री कर लेता है। एक और फलसफा ये है कि कुछ लोग केवल अपने लिए संघर्ष करते है वें लोग अपने आसपास या समाज की चिंता नहीं करते वें सफल ज़रूर हो जाते है लेकिन उनकी सफलता केवल सफलता होती है, लेकिन वें लोग जो अपने साथ-साथ समाज एवं आसपास कि चिंता करते है उनकी सफलता उनके आसपास के सभी लोगों की सफलता होती है एवं उस सफलता में असीम आनंद होता है। हम केवल अपने पर केन्द्रित ना होकर अपना कुछ समय आस पास होने वाली सामाजिक, सांस्कृतिक आदि रचनात्मक एवं क्रियात्मक गतिविधियों को भी देना चाहिए। इससे ताज़गी बनी रहेगी। कहने का मतलब यहीं है कि हम सब को अपने जीवन का कुछ हिस्सा नि:स्वार्थ भाव से सामाजिक गतिविधियों में अर्पित करना चाहिए। 

हाथ में भोगलियो लायो, चिणा चाबतो आयो।
हो भलां रे हो भलां रे घूमे चरखा तूं,
म्हारो घर रो रे मालिक तूं।। (एक लोक गीत की कुछ पंक्तियां)


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