सोमवार, 24 नवंबर 2014

सूखी डाल पर अकेला पँछी




उड़ती रेत की चादर से निकलकर आई थी चिड़िया। और पंछी को रेत से था अथाह प्रेम। रेतीली चिड़िया में अटक गया था वो। एक दिन दोनों बैठे मिले बेर पर। उस दिन के बाद हरा हो गया था वो बेर। जीवन्त हो गई थी उसकी दुनिया चीं चीं के शोर में। कुछ दिनों बाद चिड़िया बैठने लगी थी किसी विदेशी बबूल पर शायद इसिलिए अब वो रेत को झटकने लगी थी, अपने परों को देने लगी थी उस पार की चमक। पर पँछी अब भी अटका था रेत, पाकों, कच्चे डोरों, और पीलूओं में। लगता था वो थक गई है रेतीली उड़ानों से लेकिन के बावजूद पँछी उड़ता रहा उसकी उड़ाने। किसी ऐसी ही उदास शाम को चिड़िया उड़ गई। बेर की डालें सूख गई फिर से अब उदासियां बसती है वहां और तब से यूं ही पँछी अकेला बेर की सूखी डाल पर उदास बैठा तकता रहता है रेत की चादर की तरफ........

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