गुरुवार, 20 नवंबर 2014

ख़्वाब

कोई दवा ख़्वाबों को रोकने की भी इज़ाद होती,

ना टूटे ख़्वाबों के बाद यूँ आँखो से बरसात होती।

मगर कमबख़्त ख़्वाब कहते है,

क्यों ढूंढ रहा है बारिशों को रोकने की दवा,

मत रोक, बरसने दे बरसातों को,

नई कोपले बारिशों के बाद ही फूटती है,

चलो फिर से बुनता हूं कुछ ख्वाब गुपचुप,

होने देता हूं बारिशे नई कोपलों के इंतज़ार में।।

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सुमेर


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