रविवार, 7 दिसंबर 2014

घाव

बड़े होते है कुछ हादसे,
टूट जाते है मजबूत ह्रदय,
पत्थर हो जाते है फूल भी,
ज़िंदगी तेरे खेल निराले।

थी जो कुछ पल पहले खनकती खिलखिलाहट,
पल में कर जाती है गीला सन्नाटा,
बिखर जाता है सब कुछ पल में,
जिंदगी तेरे खेल निराले।

क्षण भर में बदल जाता है सब,
शेष रह जाती है बस कुछ निशानियाँ,
और दीवारों पर टंगे चेहरे,
ज़िंदगी तेरे खेल निराले।

क्षण भर के दुःख के बाद,
हादसों के गहरे घाव रह जाते है,
ताउम्र का गीला दर्द लिए
ज़िंदगी तेरे खेल निराले।

उखड़ी हूई सांस के पीछे,
निःश्वास रह जाती है कुछ सांसे,
नज़रें पलकों में समेटे गीलापन कहती है,
ज़िंदगी तेरे खेल निराले।





कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें