शनिवार, 27 दिसंबर 2014

बायरियो

बायरिया मेरे मुल्क का समाये है कितना प्यार

सौंधी खुश्बू लिए डोलता रहता है निर्जन में,

चलता है अथक इस कोने से उस कोने

लिपटता हुआ अपने प्यार से।


चूमता है बोरङियो, खेजङियों केरों को,

छू लेता है ऊँची शाखों को कभी

कभी-कभी हो जाता है उदास तो

लेटता है शाम को ठण्डी रेत पर।


पल में मिल आता है मदमस्त चलते हुए

दूर किसी अपने से

छू लेता है उसको जी भर

तृप्त कर देता है मधरी बयारों से।


काश में भी बायरिया होता

कर लेता अपने स्वप्न पूरे

उङता रहता बेधङक

इधर-उधर गाँवो खेतों में।


छू लेता उसके उङते गेसूओं को

चूम लेता उसके रेत मिले सुनहरे गालों को

कभी जाते वो गर कुम्हला

एक झोंके से खिला देता।


पल में मिल आता ताज़ा देखे किसी सपने से

ना देता किसी को मुर्झाने

उङता रहता अनवरत

चहूं ओर हँसी खिलाकर।


उतर जाता किसी सूखे कूए में

खत्म कर देता उसका बरसों का इंतजार

हटा देता रेत की जमी हुई परत

फूट उठती सूखे कूए में जलधारा पाताल से।


छूकर किसी तालाब के ठहरे शीतल जल को,

टकरा जाता किसी पसीने से लथपथ किसान से

तृप्त कर देता उसको

हल्के खुश्बू भरे एक झोंके से।


गर में होता मधरा बायरिया

उङता रहता रेगिस्तान में

झोंपङियों खेतों गवाङो की ओर

खुशियों भरी मुस्कान बिखेरता हर झोंके में।

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