शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

आधा-आधा चाँद-2

तुकबंदी- वर्तिका मिश्रा एवं सुमेर सिंह राठौड़।संकलन- हरी प्रकाश मीणा।

सुमेर-
पुराने डाकघर का कमाल बहूत सी चिट्ठियां इधर-उधर कर देता था।

वर्तीका-
लिखे थे जो मैंने ख़त तुम्हें, काश पहुँचे होते सारे तुम तक
जिनमें बयां था इश्क वो तो मेरे पास ही रह गए।

सुमेर-
कि अब सौंप देना तुम वो खत उनको हाथों से,
कम-से-कम ना रहेगा डर इधर-उधर होने का।

वर्तिका-
तलहथियाँ न खुल पाएँगी,होगी उनको छूने से भी सिहरन,
सहम ही जाऊंगी उनको देख के, कैसे कहूंगी इश्क है तुमसे?

सुमेर-
जब चार सहमी आँखे मिलेंगी,
बयां हो जायेगा सबकुछ बिना कहे ही।

वर्तिका-
कि काग़ज़ हो जाएँगे कोरे, बेमानी होंगे सब अल्फ़ाज़,
जब मिलेंगे वो दोनों, तो बातें करेगी निगाह।

सुमेर-
निगाहों की बातों को मिलेगी जब रेत की बिछावन,
चाँद-तारे तो क्या बाज़ भी देखेंगे इस इश्क को।

वर्तिका-
चमकती रेत सा ही तब दमकेगा इश्क भी,
उस इश्क में कभी होगी सिहरन तो कभी गर्माहट।

सुमेर-
और बदल जायेगा रेत में दफ़्न इतिहास,
नहीं बनेगा इस मुंडेर का अंजाम मूमल की मेड़ी जैसा।

वर्तिका-
अब न दफ़्न होगी मुहब्बत रेत में,
वो बहा करेगी ठंडी बयार सी अक्सर।

सुमेर-
लगता है फिर से आबाद होगी काक किनारे मेड़ी,
जब सैणा रा बायरिया की आवाज़ के साये में होगी आँखों की मौन बातें।

वर्तिका-
मैं जब भी करती हूं कोशिशें उसकी नींद चुराने की,
वो फिर कुछ खोज लाता है मुझे औचक कर देने की खातिर।

सुमेर-
वो खिलाड़ी थे माहिर, कुछ तो हम भी सीख गये, नींद ना चुरा सके, पर कुछ देर तो जगा आये।

वर्तिका-
वो मसरूफ रहा अपने हार जीत के खेल में,
उसने उसका दीदार यूं ही छुप छुप के नज़र भर कर लिया।

सुमेर-
सो गया ज़ुल्फो में, थका किसान सोता है जैसे खेजड़ी तले,
शायद बेसुध हो गया वो उसके 'काले' जादू से।

स्तब्ध चेहरे की रंगत बदलने लगी है उनके,
शायद तलहथियों की छूअन जादू कर गई।

वर्तिका-
कि उसने ज़ुल्फें बिखेरी थीं अपनी,उस दग़ाबाज़ के लिए,
जैसे खुदा खोल देता है धूप में छतरी बादल की,अपने बंदों के लिए।

होंठ जो खिंचने लगे हैं चाप की तरह,
ये मुस्कान असर है उन तलहथियों की छुअन की

सुमेर-
अजीब है इश्क वाले मजहब के लोग,
सिर्फ प्यार ही क्यूं फैलाते हैं?

लू बन गई है मधूर हवा,
ये असर है उनकी ज़ुल्फ़ों की छाँव का।

वर्तिका-
वो बस इश्क ही करते हैं, आशिकी ही जानते हैं।

हम्म कि नहीं मयस्सर होगी मुंडेर जोड़े को,
दरबदर भटकते ही रहते हैं ये इश्क वाले।

सुमेर-
भटककर ढूंढ लेंगे आखिर तो मुंडेर,
बाज़ भी भाग गये, मोर तो साथ ही नाचेंगे।

वर्तिका-
यायावारी भी अजब सा सुकून देती है,
नर्म तलहथियाँ हों साथ तो सर्द हवाएँ भी मज़ा देती हैं।

सुमेर-
हंसके घूमेंगे बांध के तलहथियां,
क्या हूआ गर ना मिली मुंडेर।

वर्तिका-
इस पार न मिली ना सही,
उस पार की जो दुनिया है, वहाँ तो आशियाना ज़रूर ही बनेगा।

सुमेर-
ना तोड़ पाये बाज़,
मोरों से क्या टूटेगा।

वर्तिका-
घरौंदा अब मोहब्बत का,
ज़रूर बन ही जाएगा।

सुमेर-
मिट्टी के घरौंदे पर,
इश्क का निशान छप ही जायेगा।

वर्तिका-
वीरां, रेगिस्तान भी इश्क के किस्से सुनाएगा।

सुमेर-
इश्क के किस्सों से वीरान रेगिस्तान भी गुलजार हो जायेगा।

वर्तिका-
फिर से फूल खिलेंगे, मडराएंगे भँवरे भी,
तितली अटखेली करने आ जाएगी उड़ती फिरती सी।

सुमेर-
तितली भी देखेगी टुकूर-टुकूर बैठकर कैर के फूल पर,
इश्क होगा वीराने में पसरी अकूत रेत पर।

वर्तिका-
वो आईना निहारेगी, खुद को सँवारेगी
पिया जब आवेंगे घर को तो तितली सी फिरती जावेगी।

सुमेर-
क्या पायेगी तितली इस कंटीले रेगिस्तां में,
घायल होगी खामखां उलझकर कांटो में।

वर्तिका-
फूल खिलेंगे इस रेगिस्तान में भी,
जब बरसेगा वहाँ इश्क बनके बादल।

सुमेर-
लगता है तितली ने दोस्ती कर ली कांटो से भी,
शायद कांटो पर खिलने वाले हैं फूल।

वर्तिका-
इश्क वाले हैं फूल खिला ही लेंगे, 
वीराने में काँटों को भी दोस्त बना लेंगे।

सुमेर-
अब जमेगा रंग रेगिस्तां में,
चर्चे होंगे इश्क के सारे गुलिस्तां में।

वर्तिका-
रंगीन होने ही लगी है अब ज़मीं रेगिस्तान की,
इश्क ने बिखेरा है अपना रंग सिंदूरी कुछ ऐसे।

सुमेर-
पार मुल्क के परिंदे ने पांव रखा हैं,
तपते रेगिस्तां मे छांव जूल्फ़ों की होगी।

वर्तिका-
रेत की तो फितरत ही है ऐसी,
आए कोई भी वो बाँहें फैलाए अपना लेती है।

सुमेर-
कम वो भी नहीं है बाहें फैलाने में,
इसी रेत की बांहों में पला जो है।

वर्तिका-
वो जो रेत में पला है,
होगी फितरत भी उसकी धोरों सी ही 

एक पहर यहाँ, और दूसरे पहर में कहीं और।

सुमेर-
घूम फिर के वापिस वहीं आयेगा,
अपनी जगह छोड़ के मिट जाते है धोरों के नामोनिशां।

वर्तिका-
वो भी लिए है बिलकुल माँ सा आँचल, 
जब भी लौटोगे खुशी खुशी अपना लेगी।

सुमेर-
परिंदा भी भूलकर अपनी नादानी,
समेट लेगा पँख अपने, उस आँचल में।

वर्तिका-
वो माफ करेगी उसकी हर भूल को,
अपनाएगी उसे हज़ार गलतियों के बाद भी।

सुमेर-
नादान हैं वो ना करेगा फिर गलती,
एक भूल माफ होने के बाद।

वर्तिका-
इश्क निभाना हो तो इतना तो करना ही पड़ता है,
देते हैं उन्हें मौका, हर आखिरी मौके के बाद भी।

सुमेर-
देते है उन्हें मौका, हर आखिरी मौके के बाद भी,
तभी तो इश्क महक रहा है इस तरह।

वर्तिका-
इम्तहान जो सब्र का वो लिये जा रहे हैं,
कोई जा के कह दो उनसे कि हम अंगुलियों पे साँसें अपनी गिने जा रहे हैं।

सुमेर-
एक जैसा ही हैं हाल दोनों का,
कोई क्या कहेगा खुद ही कह दे वो उनसे।

वर्तिका-
संदेसा भिजवाया है इस बार किसी कबूतर के साथ,
दुआ करो कि उसे रास्ते में कोई बाज़ न मिल जाए।

सुमेर-
इंतजार में वो हैं इस ठंड में भी छत पर,
कबूतर से कहना जल्द उड़ान भरे।

वर्तिका-
रखे वो धीर कह दो उनसे,
कि लेकर पाती प्यार की जल्द ही पहुँचेगा कबूतर!

सुमेर-
ना होता धीर इश्क में,
जाने कब पहूंचेगा लेकर प्यार की पाती कबूतर?

वर्तिका-
कि जब बिखरेगी छटा चाँदनी की,
तो मुंडेर पे बैठा मिल ही जाएगा कबूतर।

सुमेर-
कितनी छटायें गुजर गई ना दिखा कबूतर,
इंतजार में एक चाँदनी और सही।

वर्तिका-
कि अब तो शब-ए-वस्ल को आना ही होगा,
सही सलामत पहुँचेगी पाती भी और मुंडेर पे बैठेगा भी कबूतर!

सुमेर-
रोशन होने वाली है सूनी मुंडेर,
आ रही है वेला जो शब-ए-वस्ल की।

वर्तिका-
पंछी खिलखिलाएंगे, गीत मिलन के गाएंगे,
पलक पावड़े बिछाओ अब कि पिव जी घर को आएंगे।

सुमेर-
पिया मिलेंगे अब तोसे नैन,
उड़ जायेगा उस नादान पँछी का चैन।

वर्तिका-
मिलना ही था उन्हें, अब तो मिल ही जाएँगे, 
प्यार करने वाले अपना नया जहां बनाएँगे!

सुमेर-
आँखों से गीत गाएंगे, रंग-बिरंगी तितलियां उड़ायेंगे।
दोनों मिलके बंजर धरती पर रंगीन फूल खिलायेंगे।

वर्तिका-
उन्होंने बड़ी मेहनत से महकाया है ये चमन,
अब इस धरती पर भी होगा चैन ओ अमन!

सुमेर-
कि खुश है जमीं ये दो परिंदो के मिलन से,
बरसेंगे फूल सूखे चमन से।

वर्तिका-
कि बरस रहा है आसमान भी देख के ये मिलन,
सर्द मौसम में ये बारिश नहीं है, रो रहा है गगन!

सुमेर-
लुट गया है चैन उसका बेसब्र हो रहा है वो,
पगला रहा है कबसे पाती के इंतजार में।

वर्तिका-
आसमां में देखो न बादल के एक टुकड़े को,
वो बरसा रहा है तुम पर मोहब्बत अपनी

सुमेर- 
उसने कभी नहीं चुराई नज़रें,
सदैव बरसा है प्रकृति का प्यार मुझपर।

वर्तिका-
ये जो नमी मौसम में है,
ये बरसती सी आँखें तुझसे जुदा होने के गम में हैं।

सुमेर-
पँछी क्यूं चुप हो गये अचानक,
लगता है अश्कों भरे साल की आहट है।

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