गुरुवार, 1 जनवरी 2015

आधा-आधा चाँद-1

तुकबंदी- वर्तिका मिश्रा एवं सुमेर सिंह राठौड़।संकलन- हरी प्रकाश मीणा।


वर्तिका-
कि वो दोनों तो बिलकुल कबूतर के जोड़े से थे,
बस इस ज़माने की निगाहें ही बाज़ों सी हैं...

सुमेर- एक को ले गये।

वर्तिका- वो एक को ले जाना ही तो खौफ़ज़दा कर देता है!!

सुमेर- दूसरा अपने आप ही जायेगा।

वर्तिका- दूसरा अक्सर खो जाता है वीराने में।

सुमेर- विरह में बावरा पँछी।

वर्तिका- वो होती है जब भी अकेली, बिरहा ही होती उसकी सहेली।।।

सुमेर- है वो भी अकेला कहीं दूर किसी और जहां में, मर रहा होगा मौत के बाद भी, उसकी बिरहा को सोचकर।।

वर्तिका- वो मसरूफ है एक नया आशियां बनाने में, उसे खबर भी नहीं कि वो एक बज़्म उजाड़ आया है।

सुमेर- हां बना रहा है वो इक नयां आशियां उसकी बिरहा में गिरे आंसूओं को जोड़कर, अब नहीं उसे जरूरत ऐसे आशियां की जो यूं बज़्म उजाड़े।

वर्तिका:-
कि वो चाहे तो बसा ले अपनी एक नई दुनिया, हम उसकी यादों के खंडहर को ही अपनी जायदाद कहेंगे।

सुमेर-
उन्ही खंडहरों में दबकर मर जायेगी वो,
फिर तो इसी आशियां में आयेगी वो।

वर्तिका-
कि जो पत्ते शज़र से जुदा हो जाते हैं एक बार,
फिर से शाखों पे थोड़ी ना सज पाते हैं वो।

सुमेर-
गिरकर जमीं में मिल जाते हैं वो,
मिलकर नये शज़र को खिलाते है वो।

वर्तिका-
जो मंजिल एक होती तो शायद मिल भी जाते,
अब तो राहें भी जुदा हैं उनकी और मंजिल भी एक नहीं।

सुमेर-
कि कुछ गलतफहमियों ने बाज़ों को सहारा दे दिया,
वरना पँछी ये भी यूं कमजोर ना थे।

वर्तिका-
कि बाज़ नीयतों से ही कमज़र्फ थे,
कबूतरों का इश्क बदनीयत न हो सका।

सुमेर-
कमज़र्फों को ना सुहाया ख्वाबों का आशियां,
उज़ाड़ दिया कमबख्तों ने बनने से पहले ही।

वर्तिका-
उस दरख़्त पर तो चलनी ही थी आरियाँ,
कल रात बिताई थी जिसपे उस मासूम जोड़े ने।

सुमेर-
उन दोनों को क्या मालूम था, कि एक डाल पर बैठना उनका ना सुहायेगा दरख़्त वालों को।

वर्तिका-
जो कट गया उस दरख़्त से पूछिये,
वो जोड़ा बात कभी न नफरत की करता था।

सुमेर-
ना दरख़्त ने ना जोड़े ने बात की नफरत की,
फिर क्यूं कटा दरख़्त जड़ों से और जोड़ा इक-दूजे से।

वर्तिका-
सियासतदां जो थे, उनके अपने थे कुछ उसूल,
मुहब्बत को नहीं मजहब में जगह दी थी उन्होंने।

सुमेर-
जब ना दी जगह मुहब्बत को मजहब में,
तब किस बात का मजहब किस बात के चोंचले।

वर्तिका-
उनकी बातें, उनके मसले, थे जाहिलपन के निशां,
निशाना बन गए उसके, कितने ही बेज़ुबान!

सुमेर-
अब तो खुलनी चाहिए ज़ुबां,
मुट्ठीभर जाहिलों के ना बचेंगे निशां।

वर्तिका-
कि वो बोलें, तो हम बोलें,
वो न बोलें , तो हम ही क्यों बोलें।

यही सोच के न हम बोल, न वो बोले।

सुमेर-
मतलब बात हैै ये कि ना बोलेंगे कभी बेजूबां,
और यूं ही चलेगा कमज़र्फों का कारोबार।

वर्तिका-
शमशीर ओ बारूद ही जब बन जाए मजहब, 
तो कौन उठाता है कलम, कौन पकड़ता है दवात।

सुमेर-
इंतजार रहेगा उस घड़ी का, जिस दिन कलम से होकर निकलेगी दवात,
खिल उठेगी चहूंओर जोड़ों से भरी रंगीन नई शाख।

वर्तिका-
कि जितनी ज्यादा खर्च होने लगेगी स्याही,
शायद उतना ही कम बहता दिखेगा हमें लहू।

सुमेर-
बातें है सब ठंडे वक्त कि, बहता दिखता है आजकल खून कलमों में।
जियो बेफ़िक्र जीवन अपना क्या रखा है किसी के कदमों में।

वर्तिका-
कभी सर्दी की धुंध में, तो कभी सिगरेट के धुएँ में 
हर फिक्र मेरी अक्सर गुम हो ही जाती है।

सुमेर-
धूंध की रंगीनियत को हमने भी जिया हैं बहूत,
पर चर्चे तो फिलहाल सिगरेट के सुने है,
आजमाएंगे कभी ये भी,
मुफलिसी जब रिश्ता तोड़ेगी।

वर्तिका-
कि वो दिल तक का सफर तय करके जब लौट आता है,
तो उस धुएँ के साथ साथ वजूद खोता है उसका खयाल भी।

सुमेर-
कि जब चाहत हो सुथरे बोसों की तो कहां होंगे सफ़र पूरे,
यहां तो चाहत है दो हाथों के मिलने की और धूएं भरी आँखों में खोने की।

वर्तिका-
पर्दा तो ज़रूरी है न, चाहे कितनी मुहब्बत हो
तो पर्दा फिर क्यूँ न, दोनों के बीच धुएँ का ही हो?

सुमेर-
मुहब्बत भी हो, परदा भी हो, धूंआ भी हो,
और क्या चाहिए; बस जमाना आग ना लगाए।

वर्तिका-
आग कितनी भी हो मोहसिन,खयाल रखना
के बस वो जोड़ा जल न जाए।

सुमेर-
कुछ भी हो पर धूंआ बना रहेगा,
पानी रखते है हम जोड़े को आंच ना आने देंगे अब।

वर्तिका-
यकीनन धुएँ के उस पार बदल जाता है चेहरा, 
मगर जो नहीं बदलती, वो है निगाह इस पार खड़े शख्स की।

सुमेर-
शायद उसी बदलते चेहरे की सबूत है इस पार की निगाहें,
जो सो ना सकी उनींदा होकर भी।

वर्तिका-
कि अब उन आँखों में इश्क नहीं था अश्क थे,
जिन आँखों में इश्क से पहले नींद रहा करती थी।

सुमेर-
तलाश है उस इश्क की जो चैन की नींद सुलाए,
अश्कों और उनींदो वाले इश्क उन्हें ना सुहाए।

वर्तिका-
इश्क है तो अश्क भी होंगे, 
चैन ओ सुकून आशिकों से रहते हैं मीलों दूर।

सुमेर-
गेसूओं की छाँव में धूआं उड़ाने को वो जी कड़वा कर लेंगे,
आठ सुकून के लिए क्या वो दो अश्क नहीं बहा देंगे?

वर्तिका-
स्याह रातों के मेहमान होते हैं अश्क, 
दिन के उजाले में तो मुस्कान का नकाब ही ओढ़कर निकलते हैं वो।

सुमेर-
पलक पावड़े बिछा देंगे उन मेहमानों की खातिर,
जिनके साथ हो गेसूओं की छांव और धूएं से भरे....

वर्तिका-
वो सुकून कहाँ किसी समंदर के किनारे, या किसी पहाड़ी के छोर पर
जो महसूस होता है, रेत की छाती पे सोने के बाद।

सुमेर-
वो तो रेत की छाती पर सोते है, 
तलाश है तो उन्हे बस तपती रेत में शीतल छांव की।

वर्तिका-
तपती रेत से मिलता है जब जब चाँद का बदन,
तपिश उसकी भी चाँदनी में तब्दील हो जाती है।

सुमेर-
रेत भी क्या गजब है स्याह रातों में तारे प्यार बरसाते है,
चाँदनी रातों में चाँद बाहों में भर लेता है।

वर्तिका-
इसकी भी अपनी फितरत है मोहसिन,
कभी ये आग उगलती है, कभी सर्द सिहरन दे जाती है।

सुमेर-
तपती रेत से नहीं मिलता है कभी चाँद का बदन,
चाँद भी आता है तभी जब रेत पर होती है छाँव। **

वो तो है ही साहिबा, वो जो रहते उसके ह्रदय में कईं जन्मों से।

वर्तिका-
सीने में दफ्न हैं उसके राज़ जाने कितने?
ये और बात है कि कोई हमराज़ नहीं उसका

सुमेर-
चाँद है हमराज रेत का, पर उसकी है कुछ कमजोरियां,
बिना छाँव के वो भी उतर नहीं सकता।

वर्तिका-
चाँद हमराज़ जो होता तो असरदार भी होता,
फितरत में है उसकी दग़ाबाज़ी ए मोहसिन

सुमेर- 
गर होता जो चाँद दगाबाज,
तो ना आता यूं उजाले में छुपके दीदार करने।

वर्तिका-
दग़ाबाज़ है तभी तो आता है दबे पाँव रातों में।

सुमेर-
दग़ाबाज ना कहिए साहिबा, इश्क है कि रोक नहीं पाता।

वर्तिका-
दग़ाबाज़ है कि सरेआम नहीं आता।

सुमेर-
वो तो अल्हड़ है स्वभाव उसका,
चाहे दाखिल होता हो छुपकर पर आखिर चाँदनी तो सरेआम बरसाता है।

वर्तिका-
वो तो नासमझ है चाँदनी, कि चाँद उसको भी बहलाता है।

सुमेर-
जब उसका दिल ही नासमझ है फिर कैसे वो दग़ाबाज़ हो गया?

नासमझ को कुछ ना समझ आई उसकी बातें,
कैसे होगी इस तरह से उनकी मुलाकातें।

वर्तिका-
फिर नए सिरे से शुरू करो तुम सफर,
के रात जिस टीले पे सिर रख के लेटे थे वो धोरे दूर उड़ गए।

सुमेर- 
इतना कमजोर नहीं था इश्क उनका,
निशान पकड़ कर चले आये पीछे-पीछे।

वर्तिका-
जो तब ही थाम लेते हाथ तुम तो,
यूं निशां कदमों के पकड़कर तुम्हें चलना नहीं पड़ता।

सुमेर-
उन्होने तो अठखेलियों में छोड़ा था हाथ,
क्या मालूम था इस तरह से कोई झोंका आयेगा।

वर्तिका-
तुम्हें भी अटखेलियों में ही रोक लेना था न फिर उन्हें,

सुमेर-
बवंडर में कुछ ना सूझ पाया उनको,
अब नाप रहे है कदमों के निशां।

वर्तिका-
कि भँवर में पड़कर भी न छोड़ना उनका हाथ,
बस इतनी ही होती है दास्तान-ए-इश्क।

सुमेर-
छोड़ने के लिए नहीं पकड़ने के लिए छोड़ा था हाथ,
पर वो थे कि दग़ाबाज़ मान लिया।

वर्तिका-
यूं ही तो नहीं माना होगा उन्होंने दग़ाबाज़,
कुछ तो धोखाधड़ी तुमने भी की होगी।

सुमेर-
ग़र धोखाधड़ी की होती तो यूं ना नापते कदम,
ना छपती तपती रेत की छाप पगथलियों में।

वर्तिका-
इश्क सच्चा ही था उसका,
कि तपती रेत पर भी वो नंगे पाँव चला था अपने कदमों के निशां तुम्हारी खातिर छोड़ जाने को।

सुमेर-
क्या जमा है रंग शब्दों का,
एक कथित कवयित्री और एक तथाकथित दग़ाबाज़।

वर्तिका-
रंगों का कारोबार है, अल्फ़ाज़ों का बाज़ार है।
कि बिकने को बोली पे प्रेम की, हर कोई तैयार है।

सुमेर-
कि बिकने को बोली पे प्रेम कि, जो कोई तैयार है,
लगाने को सबसे ऊँची बोली वो भी तैयार है।

वर्तिका-
जो कहता है कि वो लगाएगा बोली सबसे ऊंची,
वो ये भी जाने की कीमत इश्क की जान से कम नहीं होती।

सुमेर-
बात फिर वहीं पर आके रह गयी,
जान जायेगी तो इश्क नहीं अश्क होंगे।

वर्तिका-
दिल है तो इश्क होगा ना,
इश्क है तो अश्क भी होंगे ही फिर।

सुमेर-
कि कुछ तो फर्क होता होगा बिरहा और अठखेलियों में,
वरना आंसू तो और तरीके के भी बहूत निकलते देखे हैं।

वर्तिका-
खेल नहीं होता है इश्क ऐ जानिब,
और वो खिलाड़ी था बहुत ही माहिर!

सुमेर-
कुछ यूं खेल खेले उस खिलाड़ी ने,
और वो दिशाहारा नासमझी में उलझ कर रह गया।

वर्तिका-
वो जो उलझा रहा इतना कभी खेल में तो ज़ुल्फों में,
इश्क तो उसका सुलझ जाना ही था।

सुमेर-
उलझा कर भटका दिया खेल से उस खिलाड़ी ने,
सीख रहा था वो भी इन ज़ुल्फ़ों की छाँव में।

वर्तिका-
अदा है ये भी उसकी कि,
उलझा देता है सुलझाने को पहेलियाँ वो इश्क की।

सुमेर-
उनकी आँखों की भुलभुलैया से कम थी पहेलियों की कठिनाई,
पहेलियां हल करने के चक्कर में डूब गये गहराई में।
वर्तिका-
इश्क तो फिर इश्क है 
वीराने में हो के समंदर की गहराइयों में।

सुमेर-
गौण हैं सब कुछ इन आँखो की गहराई से,
इश्क है तभी तो वो डूब रहे है।

वर्तिका-
न जात से था मतलब, न मजहब मानता था,
आशिक था वो, बस इश्क जानता था।

सुमेर-
हां सच्चा था इश्क उसका,
अश्कों से भर गया दामन
जब उसके मासूम इश्क को दग़ाबाज़ का तमगा मिला।

वर्तिका-
दग़ाबाज़ तो होते हैं फितरत के वो बाज़,
कबूतरों को धोखाधड़ी रास नहीं आती।

सुमेर-
उस मुंडेर पर है अब बाज़ों की नज़र,
जहां कबूतरों का जोड़ा बैठने वाला है।

वर्तिका-
इस बार जोड़े ने भी ठानी है,
उस बाज़ को भी इश्क सिखाएगा।

सुमेर-
तब ठीक है; जोड़ा बच जायेगा,
बाज़ या तो इश्क करेगा या भाग जायेगा।

वर्तिका-
जोड़ा बचा कि नहीं?

सुमेर-
बच गया 😄

वर्तिका-
ओह तो वहाँ वही रेत की बिछावन पर सुस्ता रहा है न!

सुमेर-
आधा चाँद आ रहा नज़र मुझे टीले के उस पार।

वर्तिका-
कि धुंध छटने लगी क्या रेगिस्तान में अभी से?

सुमेर-
कहां औकात धुंध की कि वो दिल की नज़रों के आड़े आये।

वर्तिका-
निगाहें करने लगे जब ग़ुफ्तगू इश्क में,
तो जान लो कि बात इकरार से बहुत आगे निकल गयी।

...........

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