बुधवार, 28 जनवरी 2015

मैं नारी हूं।

अगर मैं होती कुरजां
तो फेंक देती घूंघट
छोड़ देती तपती फूंकनी
उड़ती-फिरती नये-नये घट।

अगर मैं होती नन्ही चिड़िया
तो दुनिया को दिखाती हौंसला
छोड़कर गोबर की थेपड़ियां 
हरियल खेजड़ी पर बुनती घोंसला।

अगर मैं होती मोरनी
सब करते मेरी बात
छोड़कर अपमान के आंसू
हर सावन करवाती बरसात।

अगर मैं होती हिरणी
ना ऐसे कुचली जाती
छोड़कर दरिंदो का साथ
परिंदों की दुनिया पाती।

लेकिन मैं तो नारी हूं 
ऐसे ही तपती रहूंगी
रूप धरकर अनेक
मानव जाति की विधाता बनूंगी।

~सुमेर।



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