शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

अडोणो मगरियो

किसी सूखी शाम को मन बैचेन हो उठता है
सोचता हूं छोटी पहाड़ी पर चढ जोर से पुकारूं किसी को।
पर बहूत देर तक सोचने के बावजूद नहीं सूझता कोई नाम।
हालांकि खुश हूं मैं अकेलेपन से
पर कभी-कभी बैचेन कर देता है अकेलापन।
वो जो अबोले दोस्त है ना बोलते तो बहूत है
पर पता नही क्या सुनने की चाहत है कि लगता है कुछ है
जो नहीं बोल सकते ये अबोले पेड़-पंछी।
कोई तो होगा जिसके पास है वो शब्द
जो मिटा सकते है इस अज़ीब बैचेनी को।
या फिर मेरी गलतफहमी है
सुना है कि जिन शब्दों को सुनने की बैचेनी है
उन्हे सुनने के बाद बैचेनी बढ जाती है।
सच मैं तब तो मैं जरूर सुनना चाहूंगा।
ऐसा क्या है उन शब्दों में?
किसी ने बताया कि ये वही शब्द है
जो तुमने सुने थे 
अबोले दोस्तों से पहले जो साथी था उससे।
उसके बोल तो बनावटी बोल थे
कितने जल्दी बदल गये थे।
उन्हे तो मैं सुन चुका हूं।
ये जरूर उनसे कुछ तो अलग होंगे
तभी सुनने की बैचेनी है।
चलो इंतजार करता हूं।
आज चुपचाप बैठ जाता हूं उस पहाड़ी पर
देखता हूं कोई आवाज़ आती है क्या
वो जो मैं सुनना चाहता हूं
वो जिसे सुनने की चाहत ने बैचेन कर रखा है....


हां जी रे मस्ताना थारा डेरा रे लदिया जावे रे मस्ताना....


~सुमेर।






3 टिप्‍पणियां:

  1. पहाड़ की किसी चोटी से पुकारो
    या किसी कंदरा के तिमिरलोक से
    इस अखिल पारावार में आवाज़ें ही अमर है
    फलसफा कहता है कि आदि आज और आगम
    सब मौजूद है ब्रह्माण्ड में अनंत अदृश्य अछोर
    किस आवाज़ के मुंतज़िर हो मित्र ये बताओ
    सब चर अचर जगत कि आवाज़ें एक ही मूल से आई है
    सारे वर्ण शब्द और तमाम लिपियाँ उसी मूल को जायेगी।
    पर अभी तक देखी ना गयी उसकी लिखावट
    सुनी ना जा सकी उसकी आवाज़
    कायनात के घरकोल्या बनाने वाले को किसी ने ना देखा
    शायद लुक्कणा-डाई रम्ते-रम्ते वो कहीं छुप गया है
    और छुप के देख रहा है कि खेल के जो नियम तय हुए थे
    आखिर कौन कौन उसकी पालना कर रहा है
    और कौन भीरु रुगड्डियां करने लगे है।
    ये सब घरकोल्ये उसके है
    ये सब भीरु उसके है
    ये सब खेल उसका है
    ये सब कूकारियां उसकी है
    वो उसी को प्राप्त होता है
    जो उसे प्राप्त होता है.......
    (आपकी इस कविता पर मेरी मेरी कवितानुमा विनम्र प्रतिक्रिया)

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  2. इये प्रतिक्रिया तो कचर््या पा। म्याळा आखर , अवळूड़ी सेंगे।

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