बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

तिनका तिनका- 3

१. यूं कि पँछी लौट जाते थे घर शाम ढलते ही, रह जाता था बाकी सन्नाटा। अब आ गया है मौसम रेगिस्तान का, आसमां होगा, तारे होंगे और होगी डूबते सूरज की दिशा से आती मेढकों की आवाज़ें। 

ओ पँछी सूरज कब निकलेगा।


२. युँ कि हो गई थी आदत कुछ दिनों से बेपनाह सोने की, आज कईं दिनों बाद जागा था, सुबह हूई थी आज। बरगद खिल रहा था, झूंड बैठे थे उसकी डालों पर चहचहाते पँछीयों के। और रेगिस्तान के मौसम के आने की आहट भी थी इस सुबह की मधरी हवा में।




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