शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

रात परदेश में गिरी थी बर्फ

पिछले दिनों पड़ी गर्मी के बाद समेट लिए थे उन्होने,
सर्दी से बचने के सब ताने-बाने।
रात शायद परदेश में कहीं गिरी थी बर्फ,
बिना ताने-बाने के
खुले मैदान में हरियाली की गोद में सोयी थी
कुछ रेगिस्तानी ज़िंदगीयाँ।
एकाएक आई ठिठूरन ने,
हिला दिया उन ज़िंदगीयों को।
रात गिरी बूंदो के बाद सुबह के जाड़े में,
मर गई थी बड़ी मेहनत से बोई गई किसान की फसल।
चरहवाहे ने बड़ी मेहनत करके अच्छे पशू छांट के बाँधे थे
बाहर पशू मेले में जाने के लिए,
तड़के देखा तो ढीली पड़ चुकी थी उनकी रस्सियां।
चद्दरें कम थी लोग ज्यादा,
ठिठूरकर औंधे मुँह पड़े थे कुछ बच्चे मृतप्राय,
एक आदमी जो था,
सबसे सही सलामत
उसे दौड़ाया गया गाँव की और माचिस लाने,
जरूरत थी उन ठिठूरे बच्चों को सेंकने की।
कुम्हला गया था पूरा रेगिस्तां,
रात शायद परदेश में कहीं गिरी थी बर्फ।

~सुमेर।

           Image © Sumer Singh Rathore

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