रविवार, 8 फ़रवरी 2015

रेल की खिड़की


उदास मन चला था हौले-हौले
किसी पथरीले शहर से
पकङ कर रेल की खुली खिङकी
अपने रेगिस्तान की और।

बेमन गुजरा सफ़र 
ना दिखी रेत उङती जब तक
कटी रात काली
उदय हूआ सुनहरा सूर्य।

दिखी जो धूल अपने मुल्क की
खिल उठा मन का पुष्प
दौङने लगा सारा रेगिस्तान
रेल की खिङकी से।

भाग रही थी बोरङियाँ
उङते तीतरों के साथ
बिखर रहे थे आकङे के फूल
उङती धूल के साथ।

झूल रही थे खेजङी की डालियाँ
लहराते खींपो के बीच
बिखरी झोंपङिया भाग रही थी
बलखाते बाजरे से झांकती।

लटक रहे थे केर डालियों में 
बावळ में लटक रही थी बयाँ
चमक रही थी सेवण 
उगते सूरज की किरणों तले।

रंगीन पगङियाँ घूम रही थी इधर-उधर
घूँघट दिख रहे थे खिङकियों से
बकरियाँ भाग रही थी बच्चों के आगे
ऊँट के कारवाँ चल रहे थे खेत किनारे।

भाग रहे थे हरिण उछलते
रेल की गति से 
दौङता सारा रेगिस्तान दिखा
रेल की खिङकी से।



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