मंगलवार, 3 मार्च 2015

तरूवर के दो पात

खोता गया वो प्रत्येक गुजरते पल में,
जागा तो देखा सोया था किसी की यादों में।

धीरे-धीरे मौसम बदल रहा है, इस बरस की सर्दियाँ अंतिम सांसे ले रही है। हवा का शोर बढने के साथ ही दिन शांत होने लगे हैं। रातों में सन्नाटा पसर रहा हैं। बदलते मौसम की एक शुरूआती रात को कुछ पढते हूए खो गया वो, लौट रहा था वो गुजरे दिनों की और।
खोता गया वो प्रत्येक गुजरते पल में,
जागा तो देखा सोया था किसी की यादों में।

उसकी शुरूआती आदत रही थी कि ये कर दिया और ऐसे हो गया तो लोग क्या कहेंगे।
और गुड ब्वाय बनने के चक्कर में कितनी अच्छी बातें नजदीक से गुजर गई और वो उन्हे जी नहीं पाया, उसे इस बात का सदैव मलाल रहेगा, ताउम्र। हर चीज़ की एक उम्र होती है और वो उम्र गुजर जाने के बाद उन चीज़ों को करने पर वो अवधिपार दवाई की तरह असर करती है। वो कहता है कि मैं सेवन करना चाहता हूं उन चीज़ो का जो और भी अच्छी हो जाती है पुरानी होने के बाद।

उस रात वो किसी ब्लॉग को पढते हूए, 'मोह-मोह के धागे' गीत सुन रहा था और इस दौरान वो वापिस स्कुल के अंतिम दिनों में खो गया। 
स्कूल की अंतिम कक्षाओं में उसे इश्क़ हूआ था 😍 लव एट फर्स्ट साइट वाला इश्क़।
वो शुरूआत में आकर्षण था और बिछड़ने पर इश्क़ में तब्दील हो गया और फिर दोबारा वापिस मिलने से पहले ही उन दोनों को रिश्ता खत्म करना पड़ा।
ट्रेजिक एंड अॉफ लव स्टोरी।
...........
😕😕😕

एक छत के नीचे बहूत सी कुर्सियाँ थी
उन कुर्सियों के आगे थी एक बहूत बड़ी कूर्सी।
उन बहूत सी कुर्सियों में से अलग थी
दो कूर्सियाँ।
बाकि कुर्सियाँ जिस दौरान आगे वाली बड़ी कुर्सी में खोई हूई होती थी
उस दौरान दो अलग कुर्सियों के बीच चल रहा होता था कुछ।
इधर वाली कुर्सी खोई रहती थी 
उधर वाली कुर्सी में।
उधर वाली कुर्सी का ध्यान रहता था कभी
आगे वाली बड़ी कुर्सी की और तो कभी इधर वाली अलग कुर्सी की और।
उधर वाली अलग कुर्सी गुस्सा होती थी
इधर वाली अलग कुर्सी पर
क्यों कि वो आगे वाली बड़ी कुर्सी की बजाय 
उसमें क्यों खोई रहती है।
इधर वाली अलग कुर्सी को अच्छा लगता था 
उधर वाली अलग कुर्सी का गुस्सा होना।
यूँ ही दोनों कुर्सीयाँ उलझते रही पूरे साल।
और एक दिन उस छत की कुर्सीयों के चेहरे बदल गये।
उन दोनों अलग कुर्सीयों पर जो चेहरे थे
उन्हे 'इश्क़' हो गया बिछड़ने के बाद।
अब कुर्सीयों की जगह ले ली थी दो फोनों ने।
इन फोनों की किस्मत उन कुर्सीयों से अच्छी निकली
दोनों फ़ोन इश्क़ में डूबे रहते थे दिन रात।
हालांकि कभी-कभी फ़ोनों में हो जाता था झगड़ा 
और नेटवर्क चला जाता।
लेकिन आ जाता वापिस
कुछेक घड़ियां सर्च करने के बाद।
अब वो इश्क़ उतावला हो रहा था
फ़ोन से निकलने को
आने वाले थे वो दिन उससे पहले ही
दोनों फ़ोनों ने भुला दिये एक-दूसरे के नंबर
खत्म हो गया एक खबर में ही उन फ़ोनों
का तीन सालों का जुड़ाव।

जैसा कि उसने मुझे बताया जब वो यादों में खोया था।




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