शनिवार, 28 मार्च 2015

सोनार धरती

आज किला जगमगा रहा है, पूरा शहर खुश है सब मिलकर उस विदेशी पर्यटक को वापिस रवाना करने आये है।
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चेहरे पर झुर्रियां, हाथ में कैमरा लटकाये उम्र पचपन के लगभग, बस से उतरते ही उस विदेशी पर्यटक ने टैक्सी वाले को इशारा किया और टैक्सी में बैठते हूए अंग्रेजी में कहा किले ले चलो, टैक्सी ड्राइवर हतप्रभ सा उसका चेहरा ताकने लगा और फिर टैक्सी स्टार्ट कर रवाना हो गया।
टैक्सी वाले ने कुछ मिनटो बाद किले के आगे चौक के पास उसे उतार दिया, वहां का नज़ारा देखकर वह सोच में पड़ गया कहीं उसने गलत जगह पर तो नहीं छोड़ दिया, गेट के इस तरफ तो छोटी-छोटी दुकाने, सब्जी मंडी और एक पेड़ था जिसके नीचे ठेले वाला रहता था पर यहां तो बहूमंजिला दुकाने बनी है।
वह किले के पहले गेट पर पहूंचा आधा भाग गिरा हूआ, वह थोड़ा आगे पहूंचा एकदम सन्नाटा पसरा है, चारों तरफ कचरे के ढेर और किले की गिरी हूई दीवारें, बीच में बड़ा गड्ढा जिसमें नाले का पानी भरा था तभी सामने से एक बुजुर्ग आता दिखाई दिया उसने अंग्रेज को देखा तो आश्चर्य से देखने लगा।
हाय-हैलो के बाद उसने अंग्रेज से पूछा की किले पर कुछ रिसर्च करने आये हो क्या?
रिसर्च! नहीं में तो घूमने आया हूं, चालीस साल पहले भी यहां आया था तब तो बड़ी रौनक थी ये क्या गया?
बुजुर्ग पहले तो हंसा और फिर बोला उस दौरान में भी गाइड था इसी किले में। चलो लम्बी कहानी है कहीं बैठकर सुनाता हूं।
दोनों बाहर आ गये। बाज़ार में एक कॉफ़ी हॉउस में दोनों बैठ गये।
बुजुर्ग ने पूछा की तुमने इंटरनेट और टीवी पर नहीं देखी क्या इस किले के उजड़ने की कहानी? बड़ी चर्चित हूई थी।
नहीं मैंने नहीं सुनी।
चलो कोई बात नहीं मैं सुनाता हूं, लोगों की पैसा कमाने की भूख और स्वार्थीपन हद से बाहर होने लगा था।
यहां आने वाले पर्यटकों के साथ जोर-जबरदस्ती व छीना झपटी बढने लगी थी। पर्यटक कम होते गये और दुकाने बढती गई, शहर कचरे का ढेर बन गया। किले पर रोज़ाना शुरू होती नई व्यवसायिक गतिविधियों से किले पर दबाव बढने लगा। इन परिस्थितियों के फलस्वरूप पर्यटकों ने आना बंद कर दिया। धीरे-धीरे किले पर व्यवसायिक गतिविधियां बंद हो गई।
किले की दीवारें पानी के रिसाव और भार बढने के कारण दरकने लगी। ना यहां के निवासियों ने दिलचस्पी दिखाई ना सरकार ने। इक्का-दुक्का शहर प्रेमियों व संगठनों ने कोशिश की पर उनका किसी ने साथ नहीं दिया। सुरक्षा के मद्देनज़र किला सरकार ने खाली करवा दिया। तब से यहां कोई नहीं आता, आपको देखकर आश्चर्य हूआ तभी मैं अंदर चला आया। 
पर्यटक किले के इतिहास में दिलचस्पी दिखाते है पर किले का हाल देखकर वो वापिस लौट जाते है।
अंग्रेज ने आह भरी और उस बुजुर्ग के गालों से टपकते आँसूओं को देखा। बुजुर्ग ने आँखे पोंछते हूए कहा काश समय रहते चेत जाते। 
तब अंग्रेज ने कहा कि चलो कोई रिसर्च करने आया तो नहीं था पर अब इस किले को वापिस जीवन्त करके ही लौटूंगा।
बुजुर्ग ने वादा किया वो उनका पूरा साथ देगा। दोनों ने मिलकर उन लोगों व संगठनों से सम्पर्क किया जिन्होने किले को लेकर दिलचस्पी दिखाई थी। फिर धीरे-धीरे कड़ी से कड़ी जुड़ती गई। लोग भुगत चुके थे इसलिए सभी से सहयोग मिलने लगा। सबने मिलकर एक महिने में किले को चमका दिया उनकी मेहनत देखकर सरकार भी उनकी मदद को आगे आ गई। और सबकी मेहनत से किले का पुराना गौरव वापिस लौट आया। सरकार ने किले के मूल निवासियों को वापिस बसने की अनुमति प्रदान कर दी।
आज सुबह-सुबह वापिस रवाना होने  से पूर्व अंग्रेज और बुजुर्ग दोनों किले की सैर पर निकले। गेट पर पारम्परिक वैशभूषा में रोबीला मूच्छों वाले गार्डस् ने उनका अभिवादन किया। गेट के अंदर की तरफ दोनों और दुकानें सजी थी। जैसलमेरी साफा व टेवटा कमीज़ पहने दुकानदार पर्यटकों का अभिवादन कर रहे थे। अंग्रेज ने एक दुकान से साफा खरीदा।
आगे दालान में मिट्टी की चौकी बनी थी, उस पर लोक गायक मागणियार मधूर आवाज़ में गाना सुना रहे थे। दोनों ने किले की चढाई प्रारंभ की दीवार पर लगे शहर के पुराने चित्र किले की शोभा में चार चाँद लगा रहे थे। किले पर किसी वाहन का नामोनिशान नहीं एकदम शांत वातावरण।
दशहरा चौक पूरा खुला था, लोग आराम से कठपूतलियों का खेल देख रहे थे।
साफ-सुथरी गलियां। हंसमुख एवं मिलनसार लोग।
हर गली में लोकजीवन एवं संस्कृति का दर्शन करवाते नज़ारे।
दोनों बहूत खुश हूए। बुजुर्ग ने अंग्रेज का शुक्रिया अदा करते हूए कहा कि तुमने किले को नया जीवन दिया है, उसने कहा कि नहीं नहीं यह तो तुम सबकी मेहनत का असर है।
शाम को बस से लौटते समय जगमगाते स्वर्णिम किले को वह तब तक निहारता रहा जब तक वह उसकी आँखो से ओझल ना हो गया।






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