शनिवार, 4 अप्रैल 2015

लकीर

एक लकीर थी,
एकदम उजली,
लकीर कहां खत्म होती थी,
नहीं था किसी को अन्दाजा।

कहते है कि,
लकीर पार करने वाले को,
मिलेगा बहूत कुछ।

बहूत सारे लोग,
जहां भी पहूंचते,
उसी जगह को मान लेते
लकीर पार।

कुछ भटककर उलझे रहते लकीर में ही,
कुछ खप गये लकीर पार करने में,
कहते है कुछ पार पहूंचे लकीर के।

लेकिन मैंने देखा,
एक व्यक्ति,
उसने लकीर छोड़ दी,
चला नई लकीर पर,
उँगलियां उठी उसकी तरफ,
अचरज और गुस्से से,
लेकिन उसने पार कर ली लकीर,
बना दिया उस लकीर को उजला।

अब पहली लकीर की तरह,
इस लकीर पर,
दौड़ने लगे है सब,
बिना किसी ठौर के.
इस उजली लकीर को,
पार करने के स्वप्न लिए।

~सुमेर।

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