शनिवार, 2 मई 2015

डोकरियां और चाँद

कुछ समय पहले इस रेगिस्तानी इलाके में हूआ करती थी बूढी औरतें, उनमें से अधिकतर दिखती थी काले कपड़ों में। घेटियों-बकरियों को लियाड़ कर लौटे बच्चे जल्दी से दूध और छाछ में चूरी बाजरे की रोटी खाने के बाद घेर लेते थे इन बूढी औरतों को। मूंज की बुनी हूई और लकड़ी की बनी बड़ी चारपाई पर बैठा करती थी ये बूढी औरतें और आसपास की चारपाईयों पर बैठे होते थे बच्चे।
इस समय चाँरे के ऊपर चँद्रमा मुस्करा रहा होता, बूढी औरतें चाँद की और इशारा करते हूए बच्चों से कहती वो देखो बच्चों चाँद में मेरे जेसी एक बूढी औरत बैठी है, उसके पास बंधी है एक बकरी और बूढी औरत बिलौना कर रही है। बकरी के पास जो है ना वो छोटा सा वो उसका बकरिया है, कोई बच्चा बोल उठता दादी वहां गाय भी है क्या, दादी कहती 'हां गा'न बढिया'न घणाय है'।
बूढी औरतों की बातों में खोये बच्चों का कोलाहल बढने लगता, बाहर मिट्टी की चौकी पर दिनभर खेत में काम करने के बाद थके हूए किसान की नींद में कोलाहल से खलल पड़ने लगता तो वह उठकर आवाज़ लगाता 'छोकरियां केड़ो धींगड़ास मांडयो हो सूए रो नी तो हूं आवां मईंना'।
और बूढी औरतें बच्चो को डराकर सुला देती। कुछ बच्चे जो किसानों के मूँह लगे हूए होते उन्हे डराने के लिए बूढी औरतें कहती 'सू पो नी तो बार ओ देखेय हाग्गड़बिल्लो आवेय पड़यो' बच्चे डरकर बोलते दादी हम सो रहे है, बूढी औरतें हाग्गड़बिल्ले को डाँटते हूए कहती 'परो जा पा बिल्ला छोकरिया सूवेय पड़या'।
और फिर ढाणी मैं सोपा पड़ जाता, कभी-कभी आती उनींदी बकरियों की गर्दनों में लटकी टोकरियों की आवाज़ और सांय-सांय चलती मधूर हवा के आगोश में आराम फरमा रहा होता रेगिस्तान, बाख फूटने तक।


सुमेर।

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