रविवार, 10 मई 2015

पीकू, आमी तोमाके भालाबासी

पीकू

निर्देशक- शूजित सरकार
कलाकार- अमिताभ बच्चन, दीपिका पादूकोण और इरफ़ान ख़ान

पिछले डेढ साल से जीवन में फिल्मों का सूखा था, कोई फिल्म नहीं देखी, पीकू का ट्रेलर देखकर लगा कि इस सूखे को अब खत्म करना चाहिए, और फिर रविवार की शाम घूम लिया बंगाल मल्लब वहीं पीकू देख ली।

पहले तो आधी फिल्म के बाद आस-पास वाली सीट वालों ने जो प्रतिक्रीया व्यक्त की वो सुन लीजिए,
पहली-
'क्या यार बकवास फिल्म है, कहानी का अता-पता नहीं. मैंने कहा था ना गब्बर देखते है।'
दूसरी-
'वाह! क्या मूवी है मज़ा आ गया, फैमिली के साथ देखने लायक है।'

शायद एक बड़े वर्ग को यह फिल्म पसंद ना आये और हॉल की खाली सीटें इसको बयाँ भी कर रही थी।

इस पारिवारिक कॉमेडी फिल्म में कब्ज़ की बीमारी को केन्द्र में रखकर छोटी-छोटी रोजमर्रा की घटनाओं को शूजित सरकार ने बहूत ही शानदार ढंग से पिरोया है, जैसे अखबार वाला अख़बार फेंक के निकल रहा है और अमिताभ बच्चन जब साइकिल वाले से साइकिल मांगते है तो वो देने के बाद बड़बड़ाता है बाबूजी और भी कहीं जाना है, लेट हो रहा है। ये सब हमारे जीवन की सामान्य घटने वाली घटनाएं हैं जिन्हे बेहतरीन तरीके से पिक्चराइज़ किया गया है।

फिल्म को अगर एक फोटोग्राफर के नज़रिये से देखा जाये तो चीज़ो को कितने बेहतरीन तरीके से सज़ाया गया है, दीपिका का बंगाली लुक, दिल्ली और कोलकाता के घरों में सजी पेंटिग, आँखो को सुकून देने वाली लाइट।

इस फिल्म में कॉमेडी के साथ-साथ गम्भीरता का भी पुट है, बुजूर्गों के साथ हमारा व्यवहार, परिवार के प्रति बुजूर्गों का व्यवहार।

पीकू की मौसी ने कईं शादियां कर ली, लेकिन पीकू ने अभी तक शादी नहीं की, भास्कर नहीं चाहता की पीकू की शादी हो, उसको लगता है अगर वो शादी कर के चली गई तो फिर उसका ख़्याल कौन रखेगा।

दीपिका इरफ़ान के साथ कोलकाता घूमते हूए जब कहती है कि इस जगह पर फिल्म हॉल था, तो इरफ़ान कहते है तुम भी अपना घर बेच रहे हो वहां भी नई बिल्डिंग बन जायेगी, बीच-बीच में बंगाली भाषा का प्रयोग, बोलने का बंगाली लहज़ा, डायलॉग में तो फिल्म पूरे नम्बर ले जाती है।

 एक्टिंग में सब ने कमाल किया है, नौकर का दिल्ली से कोलकाता के रास्ते में भास्कर की नब्ज़ देखने वाला डायलॉग, पूरी फिल्म ही कमाल है।

यात्रा के दौरान गाड़ी रोक के इरफ़ान जब आक के छोटे पेड़ के पास बैठते है, बनारस के घाट पर बैठे इरफ़ान और दीपिका, कुर्सी ऊपर रखे सड़क से गुजरती गाड़ी, इस प्रकार हर सीन को जिस  खूबसूरती कैद किया गया है, पूरी फिल्म के दौरान बांधे रखा।

और सबसे बेहतरीन ये कि शूजित ने इस फिल्म के बहाने जो यात्रा करवाई है (दिल्ली से कोलकाता की सड़क, बनारस, कोलकाता) उसने तो फिल्म और दर्शक दोनों के पँख लगा दिया है।

शूजित ने इस फिल्म में कब्ज़ के बहाने जो नब्ज़ पकड़ी है ना वो मद्रास कैफ़े और विक्की डोनर के बाद अब उन्हे एक बेहतरीन फिल्मकार के रूप में स्थापित करेगी।

1 टिप्पणी:

  1. भास्कर नही भास्कोर बोलो
    वरना पैसे नही दूंगी नाम पट्टी लगाने के...

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