शुक्रवार, 15 मई 2015

अछी और कौआ

सुदूर रेगिस्तान में जहाँ आक, खींप और बूंठा वनस्पतियों की आधिक्यता है, एक खेजड़ी के बूढे वृक्ष के नीचे कईं गायें रहती हैं उनमें से एक गाय है अछी, सफ़ेद रंग, लम्बी पूंछ, आक के पत्तों से कान, उम्र साढे तीन बरस और अकड़ इतनी कि किसी को पास ना फटकने दे। शाम को इतनी उछलकूद मचाती कि धूल के गुबार उड़ने लगते।
पिछले कईं दिनों से वो बहूत परेशान थी, एक कौवा दोपहर में आकर उसकी पीठ पर बैठ जाता और उसके कानों में चोंच मारता रहता। कौवे को भगाने के चक्कर में वह दोपहर में आराम नहीं कर पाती, वह खोयी-खोयी सी रहने लगी, शाम को लम्बे आक के पास बैठी रहती चुपचाप। धीरे-धीरे वह थकने लगी।
एक दिन गौरी गाय जो उसकी मौसी थी, ने उससे पूछा कि अछी क्या हूआ, आजकल तुम्हारी उछलकूद बंद हो गई, इतनी उदास रहती है और थकती भी जा रही है, तुझे तो चने का चारा भी खूब मिलता है फिर क्या बात है?
काफी देर तक तक गौरी ने उसे टटोला तो उसने रूआंसी होते हूए कौवे द्वारा परेशान करने वाली बात बताई।
गौरी हंस पड़ी, बोली अरे पगली वो तुझे परेशान थोड़ी करता है, वो तो चींचड़ तोड़ने आता है। अगर तेरे शरीर पर चींचड़ हो गये ना तो तू मर जायेगी। तू भगाया मत कर कौवे को वो तुझे नुकसान नहीं पहूंचायेगा, वो एक भी चींचड़ नहीं पनपने देगा तेरे शरीर पर।
उस दिन के बाद से अछी कौवे को नहीं भगाती अब उन दोनों के बीच प्रगाढ मित्रता हो गई है। और अब फिर से अछी की उछलकूद से शाम को धूल के गुबार उड़ने लगे है।

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