बुधवार, 6 मई 2015

मौन लड़कियाँ

दिनभर की तपती रेत जब ठंडी होने की और अग्रसर होती, बंद हो चुकी होती भेड़-बकरियां गवाड़ों में, दूध ऊबल रहा होता चुल्हे पर, गर्म हवा में घुलने लगी होती जब ठंडक, उस समय रेगिस्तानीं लड़कियाँ कर रही होती बेसब्री से इंतज़ार तारों के उगने का।
ये लड़कियाँ पूरी शाम अबोलकी बैठी रहती इन दिनों से शुरू होकर सालभर तक। कहते है कि ये मौन शामें बचा लेगी उन्हें अगोत्तर में उन्हे गूंगा होने से।
अंधेरा होते ही मुश्किल से जुबां पर काबू किये ये लड़कियां, टकटकी लगाये बैठी रहती आसमान की और। ज्यों ही दिखाई देता तारा दोनों हाथों की अंगूलियाँ आपस में टकराकर खड़ी हो जाती दादी के आगे, और दादी बोलने लगती,
मिनी मा रो ऊगो तारो, सागणियां रो सारो-भारो,
झालर बाजे झींझा बाजे, झींझा रा झणकार बाजे,
सात नगारा साते बाजे,दाड़मदाओ बिजेराओ,
मूनियां री मून छूटी, बोलो मिनी राम-राम।
पाँच बार उच्चारण करते ही खुल जाती पाँचो उंगलियां और आंगन में मच जाती चिल्ल पौं।

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