गुरुवार, 4 जून 2015

बादलों से बंतळ

ये इन बादलों की क्या दुश्मनी है मुझसे,
जब भी मन किया मुँह उठाये आ गये
मेरे और चाँद-तारों के बीच,
माना कि तुम बहुत काम के हो
पालक हो हमारे
पानी बरसाते हो,
पर तुम्हे ये किसने अधिकार दिया
आ गये बीच में जब भी मन कीया,
अगर आना जरूरी हो
तो आ जाया करो,
पर जल्दी से हट भी जाया करो,
एक तो पूरे दिन इंतज़ार करें
और रात को तुम आ जाते हो
सारा मज़ा किरकिरा करने,
अब सुनो तुम बहुत अच्छे हो
रूई के फाहों से
पर आगे से ध्यान रखना
हट जाना जल्दी मेरे और चाँद-तारों के बीच से।

सुमेर।


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