शनिवार, 6 जून 2015

रात बिरत रा आखर (मनिहारिनें)


हल्की-हल्की बादलों से छुपती-छुपाती सूरज की किरणें दीवारें छूनी शुरू होती है, ऑफिस की और निकलने से कुछ वक्त पहले एक आवाज़ आती है, बाई कपड़ो ल्यो कि?।
ये मनिहारिन की आवाज़ थी। ये एक आवाज़ है जो पिछले कुछ समय से हो रहे बदलावों के बाद भी नहीं बदली है। बचपन से ही देखा है मनिहारिनों को अब भी वैसी ही है। लकड़ी की ओडी में पुराने सफेद कपड़े में बंधा सामान, कमर में बच्चा, एक हाथ में कपड़ा नापने का मीटर और गाँव की गलियों में गूंजती उसकी आवाज़। गाँव में कुछ जगहें तय होती है वहां औरतें जमा होती है और मनिहारिन के आते ही शुरू हो जाता है मोल-भाव १०० रुपये की चीज़ अंत में नाराजगी के साथ मनिहारिन ६० रुपये तक देने को राज़ी हो जाती है। बंतळ करने वाली औरतों के लिए मनिहारिनें अच्छा बहाना होती है।
एफडीआई, मॉल्स और ऑनलाइन शॉपिंग के युग में भी ये मनिहारिनें अब भी बची हुई है, गाँव की औरतों के लिए ये ही ऑनलाइन शॉपिंग है।
और आज बादलों के छाँव तले ऑफिस के रास्ते बाइकिंग का भी मज़ा आया।
हम है बाबू, बड़े बेकाबू, ना खपाओ सिर हमसे, बोल रहे कब से तुमसे, यहां चलती हमारी मर्जी, चले जाओ रखके अर्जी।
और अर्जी रखते-रखते सूरज डूब गया, शब्द लिखते हूए मैं भी डूब रहा हूं नींद के आगोश में.....

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